Saturday, April 21, 2007

ये वािदयाॅं, ये बादल, ये खुला आसमाॅं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं,
ये घटायें, ये िफजाए, ये गुमनाम जंगल,
इनकी तनहाइयों से तेरा िजक्र करता हूॅं मैं,
उडी शाख की पत्ितयो पे तेरा नाम िलखकर,
तेरी नज्म इन्हे रोज सुनाता हूॅं मैं,
ठहरे हुए पानी मे तेरी तसवीर बना कर,
तेरी परछाइयों से गुफ्तगू करता हूॅं मैं,
िफर एक ख्वाब टूटने के डर से,
कंकर उछाल कर तेरी तसवीर िमटाता हूॅं मैं,
ये झरने, ये िततिलयाॅं, ये खामोश किलयाॅंं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं |


---
वरुण (मस्तराम)

Tuesday, March 20, 2007

ये मस्ती क्या कर गये, छोड गये सब आप
दुिनयादारी छोड के, होता नहीं िमलाप
या लिदरा नाइ है, जो पी कर हम बौराय
मुक्ती की ही प्यास है जो िछन िछन बढती जाय
अपने भीतर सब िमलत, क्यो सब जग ढूढत जाय
आॅंखी अपनी मूॅंद कर द्याखौ तो सब िमल जाय
पग पग पछेले जात हूॅं हर पग राह बढाय
ज्यौ चिकया फस जात है, पछेले िफर चिल जात
लाठी तेरी क्या गयी, जैसे भैंसन की खाल
भय भीतर का मेरे बन गया मेरी ढाल
कंठन की माला मेरी, देती कछु नहीं ग्यान
राम नाम के वस्त्र मेरे करते नहीं महान
अब केवल एकिह आस है
हर आस का नास होइ जाय
ज्यो गन्ना कोल्हू िपसै, जम के गुड बन जाय
िबन तप करे न कछु िमिलहै, जो िमल माटी िमल जाय


-----
मस्तराम

Monday, July 24, 2006

शायर मस्तराम

वो कहते हैं...
वक्त बहुत कम है मेरे पास.. दो पल साथ िबता िलिजये..
क्यों चाहते हो मुझको इतना.. बस इतना बता िदिजये..

मैने कहा..
तारीफ तेरी जो करना चाहूँ.. तो सारी उमर भी कम है..
जरा फुरसत से आखों मे तो बसा लेने दो.. वक्त मेरे पास भी थोडा कम है

------
मस्तराम
िदनाँक : २४ जुलाई २००६

Monday, July 10, 2006

इंसान हूँ मैं..


उन खतो को हाथ मे िलये.. तनहा अकेला खडा हूँ मैं
सोंचता हूँ वक्त के हाथो.. कौन सी बाजी हारा हूँ मैं
रहमते खुदा होती अगर.. तो रुख मोड देता हर उस लम्हे का
पर कोई खुदा नहीं हूँ.. एक मामूली इंसान हूँ मैं

तेरी तसवीर को सीने से लगाये.. पल पल रोता हूँ मै
अब तो आँसू भी नही बहते.. इतना जङ हो गया
हूँ मैं
कभी कभी डाल पर बैठे पंिछयों को देख कर मुस्कुरा लेता हूँ मैं
अपनी ही शाखो के सहारे खडा.. एक बूढा बरगद
हूँ मैं

काश होते दो पर मेरे भी.. दूर उड जाता मैं उन यादों से
नई दुिनयाँ मे एक आिशयाँ बनाता.. अपने उन पुराने सपनों से
पर आसमान मे आजाद उडने वाला कोई पागल प्रेमी
पंिछ नही हूँ मैं
एक मामूली इंसान
हूँ मैं

वक्त नही हू.. इंसान
हूँ मैं
भुलाकर सबकुछ आगे बढ जाऊँ.. इतना ताकतवर नही
हूँ मैं
हार मानकर मौत के इंतजार मे बैठा.. एक बुजिदल कायर
इंसान हूँ मैं
एक मामूली इंसान हूँ मैं

------
मस्तराम
िदनाँक : १० जुलाई २००६

Saturday, June 17, 2006

स्मृती



माघ की ये ठंडी पवन
तुम्हारे न होने का एहसास िदलाती है
बाग मे ये अध-िखले सुमन
मुझे तुम्हारी याद िदलाती है

पवन मे तो आज भी वो वेग है
पर इनमे तुम्हारे केशों की वो सुगंध नहीं है
सुमन में तो आज भी वो तेज है
पर इनमे तुम्हारे होठों की वो मुस्कान नहीं है

सूरज की ये मीठी धूप
तुम्हारे गर्म गम हाथो का स्पर्श याद िदलाती है
मेरे हृदय मे तुम्हारे पृेम का ये रूप
िमलन की आग को और बढाती है

ओस में ये भीगी पत्ितयाँ
मुझे लगती है तुम्हारी पल्कें
फूल पर ये उडती िततिलयाँ
याद िदलाती है हमारे बीते कल के

ओस तो आज भी िगरती है पत्तो से
पर वो िगरती नहीं है तुम्हारे गालो पे
िततिलयाँ तो आज भी उडती है फूलो पे
पर वो फूल नहीं है तुम्हारे बालो में

कोयल के ये मीठे गीत
मुझे तुम्हारे मधुर स्वर याद िदलाती है
िवरह के बाद िंमलन की ये रीत
मेरे हृदय मे िमलन की आग को और जलाती है

ढलते िदन के संग बढती हुई रात
तुमसे िबछडने का समय याद िधलाती है
तुम्हारी कही हुई हर बात
आज भी मुझे याद आती है

िदन तो आज भी ढलता है
पर उसके साथ तुम नहीं होते हो
सूरज तो आज भी उगता है
पर उसके साथ तुम नहीं िमलते हो

पूनम के इस उज्जवल चाँद को देख
मुझे तुम्हारा सौंदर्य याद आता है
आसमान में तारों का ये िमलन देख
मुझमे िमलन की आग को और बढाता है

घर को जाती ये सूनी गिलयाँ
तुमसे िकये हुये वादे याद िदलाती है
गिलयों मे ये मुरझाई किलयाँ
मै अकेला क्यों हू ये मुझसे कहती है

वो गिलयाँ तो आज भी सूनी है
पर ईनमें तुम्हारे वादों की वो यादे नहीं है
वो किलयाँ तो आग भी मुरझाई है
पर ईनमें मेरे अकेलेपन के िलये वो पॄश्न नहीं है

इन राहों पर मै ये सोंचता था
िक अब मै तुम्हारे साथ हूँ
पर नहीं मै कल भी अकेला ही था
और आज भी अकेला ही हूँ

---
वरुण (मस्तराम)